पृथ्वी का उष्मा बजट (Heat budget of the earth)

पृथ्वी पर औसत तापमान लगभग एक समान रहता है। यह सूर्यातप (Insolation) और भौतिक विकिरण (Physical radiation) में संतुलन के कारण ही संभव हुआ है।  सूर्यातप (Insolation) और भौतिक विकिरण (Physical radiation) के मध्य संतुलन को ही पृथ्वी की उष्मा बजट (Heat budget) कहते हैं।

यदि सूर्य से पृथ्वी के वायुमंडल की ऊपरी सतह पर प्राप्त होने वाली कुल उष्मा को 100% मान लें तो इसमें से 35% पृथ्वी के धरातल पर पहुंचने से पूर्व ही अंतरिक्ष में परावर्तित (Reflected) हो जाती है। इसमें से 27% बादलों के ऊपरी छोर से 6% धूल के कणों द्वारा तथा 2% पृथ्वी के हिमाच्छादित क्षेत्रों द्वारा परावर्तित होकर लौट जाती है। सौर विकिरण (Solar Radiation) के इस परावर्तित मात्रा को ‘एल्बिडो (Albedo)’ कहते हैं।

शेष 65% उष्मा अवशोषित होती है जिसमे 14% वायुमंडल में तथा 51% पृथ्वी की धरातल द्वारा अवशोषित होती है। पृथ्वी द्वारा अवशोषित 51% उष्मा पुनः भौमिक विकिरण द्वारा परावर्तित (Reflected) हो जाती है। इसमें 17% सीधे अंतरिक्ष में चली जाती है और 34% वायुमंडल द्वारा अवशोषित होती है। वायुमंडल द्वारा अवशोषित उष्मा में से 6% स्वयं वायुमंडल द्वारा 9% संवहन के रूप में तथा 19% संघनन की गुप्त उष्मा के रूप में अवशोषित होती है।

वायुमंडल द्वारा कुल 48% उष्मा का अवशोषण होता है। जिसमें 14% सूर्यातप (Insolation) का तथा 34% भौतिक विकिरण की जाती है। अतः पृथ्वी के धरातल तथा वायुमंडल से अंतरिक्ष में वापस लौटने वाली विकिरण का प्रतिशत क्रमशः 17 और 48 हैं जिनका योग 65% का संतुलन कर देती है जो सूर्य से प्राप्त होती है। यही पृथ्वी का उष्मा बजट अथवा उष्मा संतुलन कहलाता है।

तापमान को नियंत्रित करने वाले कारक

  • स्थल और जल के गर्म होने की दर में भिन्नता
  • प्रचलित पवन
  • समुद्री धाराएँ
  • समुद्र तल से ऊँचाई
  • ढाल की तीव्रता और सूर्य के संदर्भ में उसकी दिशा

तापमान का क्षैतिज वितरण

मानचित्र पर तापमान के क्षैतिज वितरण को समताप रेखा द्वारा निर्दिष्ट किया जाता है। समताप रेखा वह काल्पनिक रेखा है जो समान तापमान वाले स्थानों को मिलाती है।

तापमान असंगति

किसी स्थान के औसत तापमान और उस अक्षांश के औसत तापमान के अंतर को तापमान असंगति कहते हैं। उत्तरी गोलार्द्ध में तापमान में अधिकतम तथा और दक्षिण गोलार्द्ध में न्यूनतम असंगतियाँ पाई जाती है। जब किसी स्थान का तापमान उस अक्षांश के औसत तापमान से कम होता है तो तापमान असंगति धनात्मक होती है।

तापमान का व्युत्क्रमण (Inversion of Temperature) 

कभी-कभी वायु की निचली परत में तापमान में ऊँचाई के साथ कमी होने के बदले वृद्धि होने लगती है। ऐसा सामान्यत: सर्दियों की रातों में होता है जब आकाश साफ होता है। इस परिस्थिति में पृथ्वी के धरालत और हवा की निचली परतों से उष्मा का विकिरण तेज गति से होने लगता है। इससे निचले परतों की हवा ठंडी हो जाती है। भारी होने के कारण यह ठंडी हवा धरातल के पास ही रहती है। ऊपर की हवा जिसमें उष्मा का विकिरण धीमी गति से होता है अपेक्षाकृत गर्म रहती है। ढालों पर नीचे की ओर ठंडी हवा के फिसलने से भी जमीन अधिक ठंडी हो जाती है। इस परिस्थिति में ऊँचाई में वृद्धि के साथ-साथ तापमान भी बढ़ने लगता है। इस प्रक्रिया को ही  तापमान का व्युत्क्रमण या प्रतिलोपन कहते हैं।

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