कॉर्पोरेट और कृषि ऋण माफी में अंतर

कृषि ऋण (Agricultural Debt)

जब कोई भी राज्य सरकार किसानों के कर्ज को माफ करती है, तो इसका मतलब वह कर्ज को वेव ऑफ (Wave off) कर रही होती है। इसके सीधे मायने हुए कि जिन किसानों ने बैंक से कर्ज लिया हुआ था, सरकारी वेव ऑफ के बाद उन्हें उस कर्ज को लौटाने की कोई जरूरत नहीं है। इससे बैंकों का जो नुकसान होता है, उसकी पूरी भरपाई राज्य सरकार करती है।

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कॉरपोरेट ऋण (Corporate Debt)

व्यवसायी (Businessman), बैंक से काफी बड़े और मोटे कर्ज लेते हैं और किन्हीं कारणों से वे कर्ज को लौटाना बंद कर देते हैं। इस प्रकार कॉरपोरेट कर्जदार के डिफॉल्ट हो जाने पर, 90 दिन के बाद, इस कर्ज को खराब कर्ज (Bad Loan ) की श्रेणी में रख दिया जाता है। अगर बैंक को ऐसा लगता है कि वह इस कर्ज को कर्जदार से नहीं वसूल पाएगा, तो बैंक इस लोन को राइट ऑफ कर सकता है। इस राइट ऑफ में सरकार की कोई भूमिका नहीं होती है। किसी कर्ज को राइट ऑफ करने से वह बैंक की बैलेंसशीट से हट जाता है। क्या इसका मतलब यह हुआ कि एक लोन के राइट ऑफ होने के बाद एक कॉरपोरेट अपने आगे का सफर आराम से चला सकता है? ऐसा बिल्कुल नहीं है। एक लोन को राइट ऑफ करने के बाद भी बैंक वसूली की प्रक्रिया जारी रख सकता है। इसका एक तरीका यह है कि बैंक कॉरपोरेट के साथ एकमुश्त निपटान (One time settlement) कर सकता है। अमूमन सरकारी बैंकों में यह होता नहीं है। पिछले दो साल से बैंक इंसॉल्वेंसी और बैंक्रप्सी कोड (Insolvency and Bankropsy code) का भी इस्तेमाल कर रहा है। इस कोड के तहत बैंक कर्ज वसूली के लिए उस डिफॉल्टर कॉरपोरेट को किसी और कॉरपोरेट को बेच सकता है, या फिर कॉरपोरेट को टुकड़ों-टुकड़ों में भी बेचा जा सकता है। तो किसी कॉरपोरेट का कर्ज राइट ऑफ (write off) हो सकता है, पर इसका मतलब ये नहीं कि कॉरपोरेट के लिए उसका कोई नकारात्मक परिणाम नहीं होगा।

उदाहरण –

  • भूषण स्टील। इस कंपनी ने करीब 56,000 करोड़ का कर्ज बैंकों को नहीं लौटाया। इंसॉल्वेंसी और बैंक्रप्सी कोड (Insolvency and Bankropsy code) के तहत कंपनी को टाटा स्टील (Tata Steel) को बेच दिया गया। कर्ज नहीं लौटाने की वजह से मूल प्रमोटर के हाथ से कंपनी चली गयी।
  • एस्सार स्टील (Essar Steel) के साथ भी कुछ ऐसा ही होने वाला है।

इस वित्तीय वर्ष के पहले छह महीनों में (अप्रैल से सितंबर 2018) सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने करीब 60,726 करोड़ रुपये की वसूली की है। अप्रैल से सितंबर 2017 में हुई वसूली से यह दोगुने से भी ज्यादा है। जब तक इंसॉल्वेंसी और बैंक्रप्सी कोड  (Insolvency and Bankropsy code)  नहीं था, तब तक काफी कॉरपोरेट को लोन लेकर नहीं चुकाने की आदत पड़ गयी थी। कंपनियां चलाने वाले प्रबंधकों और मालिकों को यह मालूम था कि अगर वे कर्ज न भी चुकायें तो बैंक उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकते थे। इससे क्रेडिट कल्चर को नुकसान होता था। किसानों का कर्ज माफ करने से भी यही होता है| एक ऐसे किसान का उदाहरण ले लीजिये जो कि कर्ज समय पर लौटा रहा है।

सरकारी कर्ज माफी के बाद वो बहुत ही बेवकूफ दिखेगा और आपको क्या लगता है, जब वो अगली बार कर्ज लेगा तो उसे लौटाने के बारे में सोचेगा? कर्ज माफी से किसानों को यह भी संदेश जाता है कि कर्ज चुकाने की कोई जरूरत नहीं क्योंकि आने वाले समय में सरकार चुनाव के पहले कर्ज माफ कर सकती है|

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Note :

किसानों का कर्ज वेव ऑफ होता है। इसका मतलब उन्हें कर्ज को लौटाने की कोई जरूरत नहीं है। कॉर्पोरेट कर्ज (Corporate Loan) को बैंक राइट ऑफ करता है। किसी कर्ज को राइट ऑफ कटने से वह सिर्फ बैंक की। बैलेंस-शीट से हटता है, उसे वसूलने की प्रक्रिया खत्म नहीं होती।

 

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