भारत की जलवायु

भारत की जलवायु को मानसूनी जलवायु कहा जाता है। एशिया में इस प्रकार की जलवायु मुख्यतः दक्षिण तथा दक्षिण-पूर्व में पाई जाती है।भारत की जलवायु सामान्य प्रतिरूप में लगभग एकरूपता होते हुए भी देश की जलवायु-अवस्था में स्पष्ट प्रादेशिक भिन्नताएँ हैं। जैसे – गर्मियों में, राजस्थान वेफ मरुस्थल में कुछ स्थानों का तापमान लगभग 50॰C तक पहुँच जाता है, जबकि जम्मू-कश्मीर वेफ पहलगाम में तापमान लगभग 20॰C रहता है। सर्दी की रात में, जम्मू-कश्मीर में द्रास का तापमान -45॰C तक हो सकता है, जबकि तिरुवनंतपुरम में यह 22॰C हो सकता है।

जलवायु को प्रभावित करने वाले कारक

पृथ्वी की गोलाई के कारण, इसे प्राप्त सौर ऊर्जा की मात्रा अक्षांशों के अनुसार अलग-अलग होती है। इसके परिणामस्वरूप तापमान विषुवत वृत्त से ध्रुवों की ओर सामान्यतः घटता जाता है। किसी भी क्षेत्र की जलवायु को नियंत्रित करने वाले छः प्रमुख कारक हैं –

  • अक्षांश,
  • तुंगता (ऊँचाई)
  • वायु दाब एवं पवन तंत्र
  • समुद्र से दूरी
  • महासागरीय धाराएँ
  • उच्चावच लक्षण।

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भारत की जलवायु को प्रभावित करने वाले कारक

अक्षांश

कर्क वृत्त देश के मध्य भाग, पश्चिम में कच्छ के रन से लेकर पूर्व में मिजोरम, से होकर गुजरती है। देश का लगभग आधा भाग कर्वफ वृत्त वेफ दक्षिण में स्थित है, जो उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रा है। कर्वफ वृत्त वेफ उत्तर में स्थित शेष भाग उपोष्ण कटिबंधीय है। इसलिए भारत की जलवायु
में उष्ण कटिबंधीय जलवायु एवं उपोष्ण कटिबंधीय जलवायु दोनों की विशेषताएँ उपस्थित हैं।

ऊँचाई

भारत के उत्तर में हिमालय पर्वत है। इसकी औसत ऊँचाई लगभग 6,000 मीटर है। भारत का तटीय क्षेत्र भी विशाल है, जहाँ अधिकतम ऊंचाई लगभग 30 मीटर है। हिमालय मध्य एशिया से आने वाली ठंडी हवाओं को भारतीय उपमहाद्वीप में प्रवेश करने से रोकता है। इन्हीं पर्वतों के कारण इस क्षेत्र में मध्य एशिया की तुलना में ठंड कम पड़ती है।

वायु दाब एवं पवन

भारत में जलवायु तथा संबंधित मौसमी अवस्थाएँ निम्नलिखित वायुमंडलीय अवस्थाओं से संचालित होती हैं:

  • वायु दाब एवं धरातलीय पवनें
  • ऊपरी वायु परिसंचरण तथा
  • पश्चिमी चक्रवाती विक्षोभ एवं उष्ण कटिबंधीय चक्रवात

भारत उत्तर-पूर्वी व्यपारिक पवनो वाले क्षेत्र में स्थित है , ये पवनो उत्तरी गोलार्ध के उपोष्ण-कटिबंधी उच्च दाब पट्टीयो से उत्पन्न होती है , ये  दक्षिण की ओर बहती है और कोरिओलिस बल के कारण दाहिनी और विक्षेपित होकर विषुवतीय निम्न दाब वाले क्षेत्रों की और बढ़ती है समान्तयः इन पवनो में नमी की मात्रा बहुत कम होती है क्योंकि ये स्थलीय भागों पर उतपन्न होती है एव बहती है, इसलिए इन पवनो द्वारा वर्षा कम या नहीं होती है

भारत की वायु दाब एवं पवन तंत्र अद्वितीय है। शीत ऋतु में, हिमालय के उत्तर में उच्च दाब होता है। इस क्षेत्र की ठंडी शुष्क हवाएँ दक्षिण में निम्न दाब वाले महासागरीय क्षेत्र के ऊपर बहती हैं। ग्रीष्म ऋतु में, आंतरिक एशिया एवं उत्तर-पूर्वी भारत के ऊपर निम्न दाब का क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है। इसके कारण गर्मी के दिनों में वायु की दिशा पूरी तरह से परिवर्तित हो जाती है। वायु दक्षिण में स्थित हिंद महासागर के उच्च दाब
वाले क्षेत्रा से दक्षिण-पूर्वी दिशा में बहते हुए विषुवत् वृत्त को पार कर दाहिनी ओर मुड़ते हुए भारतीय उपमहाद्वीप पर स्थित निम्न दाब की ओर बहने लगती हैं। इन्हें दक्षिण-पश्चिम मानसून पवनों के नाम से जाना जाता है। ये पवनें कोष्ण महासागरों के ऊपर से बहती हैं, नमी ग्रहण करती हैं तथा भारत की मुख्य भूमि पर वर्षा करती हैं।

इस प्रदेश में, ऊपरी वायु परिसंचरण पश्चिमी प्रवाह के प्रभाव में रहता है। इस प्रवाह का एक मुख्य घटक जेट धारा है।

जेट धाराएँ लगभग 27॰ – 30॰ उत्तर अक्षांशों के  बीच स्थित होती हैं, इसलिए इन्हें उपोष्ण कटिबंधीय पश्चिमी जेट धाराएँ कहा जाता है। भारत में, ये जेट धाराएँ ग्रीष्म ट्टतु को छोड़कर पूरे वर्ष हिमालय वेफ दक्षिण में प्रवाहित हाती हैं। इस पश्चिमी प्रवाह के द्वारा देश के उत्तर एवं उत्तर-पश्चिमी भाग में पश्चिमी चक्रवाती विक्षोभ आते हैं। गर्मियों में, सूर्य की आभासी गति के साथ ही उपोष्ण कटिबंधीय पश्चिमी जेट धारा हिमालय
के उत्तर में चली जाती है। एक पूर्वी जेट धारा जिसे उपोष्ण कटिबंधीय पूर्वी जेट धारा कहा जाता है गर्मी के महीनों में प्रायद्वीपीय भारत के ऊपर लगभग 14॰ उत्तरी अक्षांश में प्रवाहित होती है।

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अन्य महत्वपूर्ण परिभाषा

जेट धरा :-

ये एक संकरी पट्टी में स्थित क्षोभमंडल में अत्यधिक उँफचाई ;12,000 मीटर से अधिकद्ध वाली पश्चिमी हवाएँ होती हैं। इनकी गति गर्मी में 110 कि॰मी॰ प्रति घंटा एवं सर्दी में 184 कि॰मी॰ प्रति घंटा होती है। बहुत-सी अलग-अलग जेट धाराओं को पहचाना गया है। उनमें सबसे स्थिर मध्य अक्षांशीय एवं उपोष्ण कटिबंधीय जेट धाराएँ हैं।

पश्चिमी चक्रवातीय विक्षोभ :-

सर्दी के महीनों में उत्पन्न होने वाला पश्चिमी चक्रवातीय विक्षोभ भूमध्यसागरीय क्षेत्र से आने वाले पश्चिमी प्रवाह के कारण होता है। वे प्रायः भारत के उत्तर एवं उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों को प्रभावित करते हैं। उष्ण कटिबंधीय चक्रवात मानसूनी महीनों के साथ-साथ अक्टूबर एवं नवंबर के महीनों में आते है तथा ये पूर्वी प्रवाह के एक भाग होते हैं एवं देश के तटीय क्षेत्रों को प्रभावित करते हैं।

Source : NCERT

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