Category: Polity

केंद्र और राज्य संबंध

संविधान में केंद्रीय व्यवस्था के अनुरूप केंद्र तथा राज्य संबंधों की विस्तृत विवेचना की गयी है अत: भारतीय एकता व अखंडता के लिए केंद्र को अधिक शक्तिशाली बनाया गया है |  केंद्र व राज्य के मध्य संबंधो का अध्यनन तीन दृष्टिकोण से किया जाता है – विधायी संबंध  अनु० (245-255) प्रशासनिक संबंध अनु० (256-263) वितीय संबंध अनु०

उच्च न्यायलय की शक्तियां व क्षेत्राधिकार

उच्च न्यायालय को अपने अधीनस्थ न्यायालयों के विरुद्ध अपील सुनने का अधिकार है अत: उच्च न्यायालय राज्य में अपील करने का सर्वोच्च न्यायालय होता है | उच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार निम्न लिखित है – मूल क्षेत्राधिकार  न्यायदेश (रिट) क्षेत्राधिकार  अपीलीय क्षेत्राधिकार  अभिलेखीय क्षेत्राधिकार  पर्यवेक्षीय क्षेत्राधिकार  अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण  न्यायिक समीक्षा  मूल क्षेत्राधिकार  इसके अंतर्गत

राज्यपाल की शक्तियां (Governors Powers)

राज्यपाल को राष्ट्रपति के समान ही कार्यकारी , विधायी , वित्तीय व न्यायिक शक्तियां प्राप्त है , किंतु राज्यपाल को राष्ट्रपति के समान ही सैन्य व आपातकालीन शक्तियां प्राप्त नहीं है। कार्यकारी शक्तियां (Executive powers) राज्य सरकार के सभी शासन संबंधी कार्य राज्यपाल के नाम पर किए जाते है। राज्यपाल मुख्यमंत्री  की नियुक्ति करता है

संसदीय समितियां (Parliamentary committees)

संसद एक वृहद निकाय है जो अपने समक्ष लाए गए विषयों पर प्रभावी रूप से विचार करती है तथा इसके कार्य भी अत्यंत जटिल है , अत: पर्याप्त समय व विशेषज्ञता के आभाव में संसद अपने वैधानिक उपायों व अन्य मामलों की जाँच विभिन्न संसदीय समितियों के सहयोग से करती है। भारतीय संविधान के अंतर्गत

राज्य के नीति निदेशक तत्त्व (DPSP)

राज्य के नीति निदेशक तत्त्व (DPSP-DIRECTIVE PRINCIPLES OF STATE POLICY) का उल्लेख संविधान के भाग – 4 में अनु० 36 – 51 के मध्य किया गया है। इन्हें वर्ष 1937 में निर्मित आयरलैंड (Ireland) के संविधान से लिया गया है। राज्य के नीति निदेशक तत्व शासन व्यवस्था के मूलभूत अधिकार है , ये देश के प्रशासकों

संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार : अनुच्छेद (29-30)

अनुच्छेद (29) – अल्पसंख्यकों के हितो का संरक्षण संविधान में अल्पसंख्यकों के हितो के संरक्षण के दो आधार बताए गए है। धार्मिक (Religious) भाषायी (Linguistic) अल्पसंख्यकों के हितो के संरक्षण के अंतर्गत निम्न प्रावधान किए गए है — इसके तहत यह प्रावधान किया गया है की भारत के किसी भी भाग में रहने वाले नागरिको

 धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार : अनुच्छेद (25-28)

अनुच्छेद (25) – अंत:करण , धर्म के आचरण की स्वतंत्रता और धर्म का प्रचार – प्रसार करने की स्वतंत्रता  इसके अंतर्गत अंत:करण की स्वतंत्रता निहित है। जिसके तहत व्यक्ति ईश्वर के किसी भी रूप को मान सकता है , इसका प्रचार व प्रसार कर सकता है और यह भी स्वतंत्रता की यदि व्यक्ति चाहें तो

मूल अधिकार (Fundamental Rights)

संविधान में मूल अधिकारों (Fundamental Rights) का उल्लेख अनु० (12-35) के मध्य किया गया है। मूल अधिकार वें अधिकार है जिनका  हनन होने पर राज्य सरकार इन्हें दिलाने को बाध्य है ऐसा न होने पर व्यक्ति सीधे उच्चतम व उच्च न्यायालयों (Supreme Court or High Court) जा सकते है । मूल अधिकारों के वादों को देखने के लिए स्थानीय न्यायालयों  को

भारतीय नागरिकता प्राप्त करने के प्रावधान – अधिनियम 1955

नागरिकता प्राप्त करने के लिए भाग – 2 के अतिरिक्त नागरिकता अधिनियम 1955 बनाया गया जिसे अंतिम बार 2011 व 2015 में संसोधित किया गया जिसकी निम्न विशेषताएं है। जन्म के द्वारा नागरिकता  (Citizenship by Birth)  यदि कोई व्यक्ति 26 जनवरी 1950 के बाद परन्तु 1 जुलाई 1947 से पूर्व भारत में जन्मा कोई भी व्यक्ति जन्म के

भारतीय राज्य पुनर्गठन आयोग

स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत में 549 रियासते भारत में शामिल हो गयी आयर बची हुई तीन रियासत (हैदराबाद , जूनागढ़ और जम्मू –कश्मीर) भारत में शामिल होने से मन कर दिया , लेकिन बाद में निम्न तरीको से इन्हें भारत में मिला लिया गया । हैदराबाद (Hyderabad) – सैन्य कार्यवाही द्वारा जूनागढ़ (Junagadh) – जनमत संग्रह