बिहार राज्य विधानमंडल (Bihar State Legislature)

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 168 के अनुसार प्रत्येक राज्य का एक विधानमंडल होगा, जिसमें राज्यपाल, विधानसभा एवं विधानपरिषद् होगी।

अनुच्छेद 169 के अनुसार भारतीय संसद् किसी भी राज्य के लिए विधानपरिषद् की स्थापना या उसकी समाप्ति के लिए नियम व उपनियम बना सकती है, किन्तु इसके लिए संबंधित राज्य की विधानसभा द्वारा 2/3 बहुमत से प्रस्ताव पारित होना चाहिए।

वर्तमान में बिहार विधानमंडल में दो सदन है –

विधानपरिषद् (Legislative council)

उड़ीसा व बिहार में विधानपरिषद् की स्थापना 7 फरवरी, 1921 को संयुक्त रूप से की गयी तथा इसका प्रथम सभापति सर वाल्टर मांडे को नियुक्त किया गया था।  भारत के संविधान के अनुच्छेद 169 में राज्यों में विधानपरिषद् के गठन का उल्लेख है। संविधान के अनुसार विधानपरिषद् के सदस्यों की कुल संख्या विधानसभा के कुल सदस्य संख्या के 1/3 भाग से अधिक नहीं हो सकती, किन्तु  विधानपरिषद् में कम-से-कम 40 सदस्य होने अनिवार्य हैं (अपवादस्वरूप जम्मू-कश्मीर विधानपरिषद् की कुल सदस्य संख्या 36 है)

  • वर्तमान में बिहार विधानपरिषद् में सदस्यों की कुल संख्या 75 है। विधानपरिषद् स्थायी सदन है, जिसका कभी विघटन नहीं होता है।
  •  विधानपरिषद् के सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है किन्तु प्रत्येक 2 वर्ष के अंतराल पर इसके एक-तिहाई सदस्य सेवानिवृत्त हो जाते हैं।
  • विधानपरिषद् का सत्र राज्यपाल द्वारा आहूत किया जाता है।
  • किसी भी वर्ष में विधानपरिषद् के कम-से-कम दो सत्र होना आवश्यक है एवं प्रथम  सत्र व अंतिम सत्र के मध्य  6 माह से अधिक का अंतर नहीं होना चाहिए।
  • विधानपरिषद् के एक-तिहाई सदस्य स्थानीय संस्थाओं, नगरपालिका, जिला परिषद् आदि के सदस्यों के द्वारा चुने जाते हैं।
  • एक-तिहाई ( सदस्य विधानसभा के सदस्यों के द्वारा चुने जाते हैं। 1/12 सदस्य राज्य /के उच्चत्तर माध्यमिक विद्यालयों एवं कॉलेजों में कम-से-कम तीन वर्ष का अनुभव रखनेवाले अध्यापकों के द्वारा चुने जाते हैं।
  • 1/12 सदस्य बिहार के वैसे निवासी, जो भारत के किसी विश्वविद्यालय से स्नातक हों एवं जिन्होंने स्नातक की उपाधि कम-से-कम तीन वर्ष पहले प्राप्त कर ली हो, के द्वारा चुने जाते हैं।
  • शेष 1/6 सदस्य राज्यपाल के द्वारा कला, साहित्य, विज्ञान, सहकारिता तथा समाज-सेवा के क्षेत्र में कार्य करने वाले को मनोनीत किया जाता हैं।
  • विधानपरिषद् का अधिवेशन आरंभ होने के लिए इसके कुल सदस्यों का 1/10 भाग या कम-से-कम 10 सदस्य (जो भी ज्यादा हो) का होना अनिवार्य  है।
  • विधानपरिषद् के सदस्यों को सदन का सत्र प्रारंभ होने के 40 दिन पूर्व तथा सत्र समाप्त होने के 40 दिन बाद के मध्य में दीवानी मुकदमों के लिए बंदी नहीं बनाया जा सकता है।

विधानसभा 

विधानसभा का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है, किन्तु आपातकाल की स्थिति में संसद  द्वारा इसकी अवधि छह माह तक बढ़ाई जा सकती है। एक बार में विधानसभा  का कार्यकाल अधिकतम एक वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है। यह प्रावधान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 172 (1) में उल्लेखित है।

किसी दल को स्पष्ट बहुमत ना मिलने की स्थिति या सरकार के बहुमत खो देने की स्थिति में राज्यपाल के द्वारा विधानसभा का कार्यकाल पहले भी खत्म किया जा सकता है। विधानसभा का अधिवेशन राज्यपाल द्वारा आहूत किया जाता है, किन्तु  विधानसभा के दो अधिवेशन के मध्य छह माह  का अंतर होना चाहिए।

बिहार विधानसभा की कुल 243 सीटों में 38 सीटें अनुसूचित जाति (SC) के लिए, 2 सीटें अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए  तथा 1 सीट एंग्लो इंडियन समुदाय के लिए  आरक्षित हैं –

 विधानसभा सदस्य बनने की योग्यताएँ

  • वह भारत का नागरिक हो एवं कम-से-कम 25 वर्ष की उम्र का हो
  • वह भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन लाभ के पद पर न हो
  • वह दिवालिया या पागल न हो

विधानसभा अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 178 के अनुसार प्रत्येक राज्य की विधानसभा के लिए एक अध्यक्ष एवं एक उपाध्यक्ष का पद निर्धारित किया गया है। इनका चुनाव विधानसभा के सदस्यों के द्वारा किया जाता है। विधानसभा अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष को कम-से-कम 14 दिन की पूर्व सूचना से विधानसभा में लाए गए अविश्वास प्रस्ताव द्वारा पद से हटाया जा सकता है।

सामान्य स्थिति में विधानसभा अध्यक्ष  चुनाव में भाग नहीं लेता किन्तु मत बराबर होने की स्थिति में विधानसभा अध्यक्ष का मत निर्णायक होता है।

Note :

वर्तमान में भारत में 7 राज्यों में उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, बिहार, महाराष्ट्र, जम्मू-कश्मीर, तेलंगाना एवं आंध्र प्रदेश में विधानपरिषद् की व्यवस्था है।

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