भक्ति आंदोलन (Bhakti Movement)

bhakti movement

भारत में  भक्ति आंदोलन का विकास 7वीं और 12वीं शताब्दी के मध्य सर्वप्रथम दक्षिण भारत के तमिलनाडु में हुआ, इसका उल्लेख तमिल ग्रन्थ तिरुमुरई तथा प्रबंधंम में मिलता है | 8वीं  शताब्दी में तमिल प्रदेश में नयनार (शिव भक्त) एवं अलवर (विष्णु भक्त) द्वारा भक्ति मार्ग के माध्यम से शैव और वैष्णव धर्म को अत्यधिक लोकप्रियता मिली|

अलवार

अलवार का अर्थ होता है – ज्ञानी व्यक्ति| अलवर संत एकेश्वरवादी थे, तथा वे लोगो के ह्रदय पर अध्यात्मिक शासन करते थे| अलवार  संतो का मानना था कि विष्णु की भक्ति एवं पूजा से ही मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है | अलवार संतो की संख्या 12  थी , जिनमे – पोयगई,  भूतत्तालवार, मैयालवार, तिरुमालिसै आलवार, नम्मालवार, मधुरकवि आलवार , कुलशेखरालवार, पेरियालवार, अण्डाल (महिला संत), तांण्डरडिप्पोड़ियालवार, तिरुरपाणोलवार, तिरुमगैयालवार| अलवारो अलवार एकमात्र महिला संत अण्डाल थी|

नयनार

शिव भक्तो को नयनार कहा जाता था, इनकी संख्या 63 थी, जिनमे तिरुनावुकरशु, तिरुज्ञान सम्बन्दर, सुन्दरमूर्ति तथा मनिवक्ववाचगर प्रमुख थे| शैव संतो के भक्ति गीतों को देवारम नमक संकलन में संकलित किया गया है, इनके अंतर्गत प्रणीत भक्ति गीत तिरुपाडुयम (तिरुमुडे) कहे जाते है|

शंकराचार्य (788-820 ई.)

  • जन्म: 788 ई., कलाड़ी (केरल)
  • निधन: 820 ई., केदारनाथ
  • पूरा नाम: शंकर
  • गुरु: गोविंदा भगवत्पाद
  • माता-पिता: आर्यम्बा, शिवगुरु
  • दार्शनिक मत : अद्वैतवाद

शंकराचार्य ने भारतवर्ष में चार मठों की स्थापना की थी जो अभी तक बहुत प्रसिद्ध और पवित्र माने जाते हैं और जिनके प्रबंधक ‘शंकराचार्य’ कहे जाते हैं। वे चारों स्थान ये हैं-

  • बद्रीनाथ (विष्णु)
  • शृंगेरी पीठ (शिव)
  • द्वारिका को शारदा पीठ (कृष्ण)
  • पुरी (बलभद्र एवं सुभद्रा)

शंकराचार्य ज्ञान मार्गी थे| जगत को मिथ्या तथा ब्रह्मा (ईश्वर) को सत्य मानते थे| ब्रह्मा प्राप्ति के लिए उन्होंने ज्ञान मार्ग पर बल दिया तथा उनका दर्शन अद्वैतवाद के नाम से प्रसिद्ध है | प्रमुख रचनाएँ – ब्रह्मसूत्रभाष्य, गीताभाष्य, उपदेश साहसी, प्रपंच, सारतंत्र, तथा मारीषापच्छम आदि|

रामानुजाचार्य  (1017-1137 ई.)

  • जन्म: 1017 ई., तिरुपति (आंध्रप्रदेश)
  • गुरु: यादव प्रकाश
  • माता-पिता : कान्तिमति  , केशव
  • दार्शनिक मत : विशिष्टता द्वैतवाद

रामानुज सगुण ईश्वर में विश्वास करते थे तथा भक्ति मार्ग को मोक्ष का साधन मानते थे|  इन्होने विशिष्टता द्वैतवाद दर्शन का प्रतिपादन किया तथा वैष्णव धर्म  को एक दार्शनिक आधार प्रदान किया| शंकराचार्य ब्रम्हा को सत्य तथा शेष जगत को मिथ्या माना किन्तु रामानुज  अनुसार जीव आनंदमय, चैतन्यमय, स्वयं प्रकशित तथा विशिष्टपूर्ण है तथा जगत मिथ्या न होकर सत्य है| प्रमुख रचनाएँ – वेदांतसार, वेदार्थ संग्रह, वेदांतदीप, वेदांतसवहम, ब्रह्मसूत्र भाष्य तथा भगवतगीता पर टीका प्रमुख है |


भक्ति आंदोलन के लोकप्रिय होने का कारण स्थानीय भाषाओं का उपयोग था|भक्ति संतों ने अपने छंदों की रचना स्थानीय भाषाओं में की तथा संस्कृत में की गई रचनाओं का भी हिन्दी में अनुवाद किया जिससे व्यापक रूप से जनता उन्हें समझ सके। इस क्रम में

  • ज्ञानदेव ने मराठी में लिखा|
  • कबीर, सूरदास एवं तुलसीदास ने हिन्दी में अपने ग्रंथ लिखे|
  • शंकरदेव असमी को लोकप्रिय बना रहे थे|
  •  चैतन्य व चंडीदास बंगाली में संदेश का प्रसार कर रहे थे तो मीराबाई हिन्दी व राजस्थानी में|
  • इसके अतिरिक्त भक्ति कविताओं की रचना कश्मीरी, तेलुगु, कन्नड़, उड़िया, मलयालम, मराठी व गुजराती भाषा में भी की गई।

कबीर, नामदेव और गुरुनानक जैसे संतों ने परमेश्वर के निराकार रूप की भक्ति का प्रचार किया। 

कबीर (1440 ई. – 1518 ई.) 

  • जन्म – 1440 ई. (काशी)
  • गुरु – रामानंद
  • प्रमुख शिष्य – दादू एवं मूलक दास|

कबीर एक ब्राह्मण विधवा के पुत्र माने जाते हैं जिसने उनका परित्याग कर दिया। उनका पालन पोषण एक मुस्लिम बुनकर के घर में हुआ| कबीर की विचारधारा विशुद्ध अद्वैतवाद थी, वे मानते थे कि ईश्वर तक पहुँचने की राह व्यक्तिगत रूप से की गई भक्ति के अनुभव के माध्यम से है|  कबीर ने धर्म में सादगी पर बल दिया और कहा कि भगवान को पाने का सबसे आसान तरीका भक्ति है तथा वे हिन्दू मुस्लिम समन्वय के समर्थक थे|

गुरु नानक (1469 ई. – 1539 ई.)

  • जन्म – 1469 ई. तलवंडी (ननकाना साहिब, पाकिस्तान)
  • ज्ञान प्राप्ति – कालीबेन नदी के किनारे
  • माता-पिता – तृप्ता देवी और कालू
  • दार्शनिक मत – एकेश्वरवाद

बचपन से ही आध्यात्मिक जीवन के प्रति उनका झुकाव था। वे दरिद्र एवं जरूरतमंद लोगों की सहायता करते थे| उनके शिष्य स्वयं को सिख कहते थे| कबीर की तरह ही गुरू नानक भी समाज सुधारक के साथ साथ धार्मिक शिक्षक भी थे| उन्होंने समाज में महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए प्रयास किए| उनके उपदेशों को  सिखों के  5 वे गुरु अर्जुन देव ने  गुरू ग्रन्थ साहिब (सिखों के पवित्र ग्रन्थ) में संकलित किया|

वैष्णव आंदोलन

इस आंदोलन के अंतर्गत परमेश्वर के साकार रूप की भक्ति पर आधारित आंदोलन भी विकसित हुआ| यह जिसे वैष्णव आन्दोलन कहा जाता है, जो मुख्यत: राम और कृष्ण पूजा पर आधारित है। जो भगवान विष्णु के अवतार माने जाते हैं। इस आंदोलन के मुख्य प्रतिपादक सूरदास, मीराबाई, तुलसीदास और चैतन्य थे। उनके अनुसार मुक्ति का मार्ग कविता, गीत, नृत्य और कीर्तन के माध्यम से ही है।

सूरदास (1483-1563 ई. )

  • जन्म – 1483 ई.  (रुनकता)
  • गुरु –  बल्लभाचार्य
  • प्रमुख रचना – सूरसागर (श्रीकृष्ण के बाल्यकाल जीवन का वर्णन), सूरसारावली तथा साहित्य लहरी

सूरदास एक नेत्रहीन कवि थे जिनके गीत कृष्ण पर केन्द्रित थे| उनकी कृति, सूरसागर में कृष्ण के बचपन एवं यौवन का वात्सल्यपूर्ण एवं स्नेहपूर्ण वर्णन है|

मीराबाई (1598-1546  ई.)

  • जन्म – 1498 ई.  (कुदवी {मेड़ता})
  • गुरु –  रैदास
  • पिता – रतनसिंह राठौर
  • पति – भोजराज (राणा मानसिंह के पुत्र)

मीराबाई ने भी अपने गीतों के माध्यम से कृष्ण के लिए अपना प्रेम व्यक्त किया है| वह कम उम्र में विधवा हो गई थी और उन्होंने अपना जीवन अपने प्रभु की भक्ति में स्वयं को उनकी दासी मानते हुए व्यतीत किया|

चैतन्य (1486-1533 ई.) 

  • जन्म – 1486 (बंगाल)
  • उपासक – कृष्णा
  • दार्शनिक मत – अचिन्त्य भेदाभेद|

चैतन्य के प्रयासों से वैष्णव (भक्ति) आंदोलन पूर्व में भी फैल गया। चैतन्य कृष्ण को विष्णु के एक अवतार के रूप में नहीं अपितु भगवान के सर्वोच्च रूप मैं मानते थे। वे कृष्ण की भक्ति कीर्तन के माध्यम से व्यक्त करते थे जो कि घरों में, मंदिरों में और यहाँ तक कि सड़कों पर जुलूस के रूप में भी किये जाते थे| अन्य भक्ति संतों की तरह चैतन्य भी जाति का भेदभाव न करके हर किसी का स्वागत करते थे|

 तुलसीदास (1532 ई. – 1623 ई.)

राम की पूजा रामानंद (1400 ई. – 1470 ई.) जैसे संतों द्वारा लोकप्रिय की गई। उन्होंने राम को सर्वोच्च देवता के रूप में माना। महिलाओं एवं निर्वासितों का भी स्वागत किया गया। राम के सबसे प्रसिद्ध भक्त तुलसीदास (1532 ई. – 1623 ई.) थे|

  • जन्म – 1532 ई. (U.P)
  • माता-पिता – हुलसी और आत्मा राम दुबे
  • पत्नी – रत्न वाली

वैष्णव संतों ने हिन्दू धर्म के व्यापक ढांचे के भीतर अपने दर्शन को विकसित किया| उन्होंने धर्म में सुधार और साथियों में परस्पर प्रीति का उपदेश दिया|मुख्य तौर पर उनका दर्शन मानवतावादी था| तुलसीदास  की प्रमुख रचनाएँ – रामलला नहछू, वैराग्य संदीपनी, बरवै रामायण, पार्वती मंगल, गीतावली, विनय पत्रिका आदि|

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