अकबरकालीन शासन व्यवस्था

Akbar Mughal Emperor

शासन व्यवस्था

अकबर ने संपूर्ण साम्राज्य को 15 सूबो (प्रांतो) में विभक्त कर दिया था। सूबों को सरकार (जिला), परगना (तहसील) तथा गांवों में विभक्त कर दिया। इनका कार्यभार निम्नलिखित अधिकारियों द्वारा संचालित किया जाता थाः ।

सूबा/प्रांतीय प्रशासन:

सिपासालार – यह कार्यकारी मुखिया था, जिसे बाद में निज़ाम या सूबेदार के नाम से जाने जाना लगा।
दीवान – यह राजस्व विभाग का मुखिया था।
बख्शी – यह सैन्य विभाग का मुखिया था।

सरकार/जिला प्रशासन:

फौजदार – प्रशासनिक मुखिया
अमल/अमलगुजार – राजस्व वसूलने वाला अधिकारी
कोतवाल – कानून व्यवस्था को संभालने वाला अधिकारी।

परगना/तहसील प्रशासनः

शिकदार – कानून व्यवस्था को संभालने वाला अधिकारी
आमिल/कानूनगो – राजस्व वसूलने वाला अधिकारी।

ग्राम प्रशासन:

  • मुकद्दम – ग्राम प्रधान
  • पटवारी – लेखपाल।
  • चौकीदार

मनसबदारी व्यवस्था:

मनसबदारी फारसी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है – पद । इसके दो भाग है, जात और सवार। इस व्यवस्था के अंतर्गत प्रत्येक अधिकारी को एक पद (मनसब/जात) दे दिया जाता है, जिसके अधीन निश्चित मात्रा में सवार (घुड़सवार एवं कुशल सैनिक) होते थे।  मुग़लकाल में मनसबदारी व्यवस्था शुरू करने का श्रेय अकबर को जाता है। जिसे लागू करने में अकबर मध्य एशिया और मंगोलो से प्रेरित था। मनसबदारो की नियुक्ति सैन्य विभाग का सर्वोच्च अधिकारी मीर बख्शी के द्वारा की जाती थी।

भू-राजस्व सुधारः

अकबर ने राजस्व प्रशासन की योजना तैयार करने के लिए राजा टोडरमल को 1582 में शाही दीवान नियुक्त किया।

राजस्व

प्रशासन की संपूर्ण व्यवस्था टोडरमल द्वारा ही निर्मित की गई, जिसे बगदाद के काजी अबू याकुब की पुस्तक किताब-उल-खराज से ग्रहण किया गया। टोडरमल के यह सुधार आइने-दहशला (10 वर्षीय सुधार) के नाम से जाने गए। यह जब्ती प्रणाली का विकसित रुप है, जिसमें पिछले 10 वर्षों के उत्पादन तथा उत्पादन मूल्य के आंकलन के आधार पर 1/3 राजस्व निर्धारित किया जाता था। सामान्यतः यह आंकलन फसलो के रुप में होता था तथा वसूली नकदी रुप में होती थी।

  • कानूनगो – यह एक राजस्व अधिकारी होता था, जिसका कार्य राजस्व संबंधी आंकड़े एकत्रित करना था।
  • करोडी – यह एक करोड़ दाम (2.5 लाख रुपय अर्थात् 1 रुपया = 40 दाम) के बराबर राजस्व की वसूली करने वाला अधिकारी था।

अकबर ने उत्पादकता के आधार पर कृषि योग्य भूमि को 4 भागों में बांटा:

पोलज – जिस पर प्रतिवर्ष खेती होती थी।
परती – जिस पर एक वर्ष के अंतराल पर खेती होती थी।
चाचर – जिसे 3-4 वर्षों तक बिना बोये छोड़ा जाता था।
बंजर – इस भूमि को 5 या इससे अधिक वर्षों तक जोता-बोया नहीं जाता था।

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