डॉलर विश्व की सबसे मज़बूत मुद्रा क्यों ?

भारत में इस समय सबसे अधिक चर्चा अमेरिकी डॉलर (U.S. Dollar) के मुकाबले भारत के गिरते रुपये के मूल्य की हो रही है, ज्ञातव्य है कि 1 जनवरी 2018 को एक डॉलर का मूल्य 63.88 था, इसका मतलब है कि जनवरी 2018 से अक्टूबर 2018 तक डॉलर के मुकाबले भारतीय रूपये में लगभग 14% की गिरावट आ गयी है|

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यह गिरावट सिर्फ भारतीय रुपये में नहीं आई है बल्कि विश्व की अन्य मुद्राओं जैसे रूस के रूबल (Russia Ruble ), चीन के युआन (China’s Yuan) और जापानी येन (Japanese yen) के मूल्यों में भी डॉलर के मुकाबले गिरावट आई हैविश्व में डॉलर (Dollar) की कीमत बढ़ती ही जा रही है अर्थात अमेरिकी डॉलर (U.S. Dollar) विश्व की सबसे मजबूत मुद्रा मानी जा रही है|

डॉलर की मजबूती का इतिहास (History of the strength of the Dollar)

वर्ष  1944 में ब्रेटन वुड्स (Bretton Woods) समझौते के बाद डॉलर (Dollar) की वर्तमान मज़बूती की शुरुआत हुई थी, उससे पहले ज़्यादातर देश केवल सोने को बेहतर मानक मानते थे, उन देशों की सरकारें वादा करती थीं कि वह उनकी मुद्रा को सोने की मांग के मूल्य के आधार पर तय करेंगे|

New hampshire के ब्रेटन वुड्स(Bretton Woods) में दुनिया के विकसित देश मिले और उन्होंने अमरीकी डॉलर (US Dollar) के मुक़ाबले सभी मुद्राओं की विनिमय दर को तय किया| उस समय अमरीका के पास दुनिया का सबसे अधिक सोने का भंडार था| इस समझौते ने दूसरे देशों को भी सोने की जगह अपनी मुद्रा का डॉलर को समर्थन करने की अनुमति दी|

 सन 1970 की शुरुआत में कई देशों ने मुद्रास्फीति से लड़ने के लिए डॉलर के बदले सोने की मांग शुरू कर दी थी, ये देश अमेरिका को डॉलर देते और बदले में सोना ले लेते थे, ऐसा होने पर अमेरिका का स्वर्ण भंडार खत्म होने लगा| उस समय के अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन ने अपने सभी भंडारों को  समाप्त करने की अनुमति देने के बजाय डॉलर को सोने से अलग कर दिया और इस प्रकार  डॉलर और सोने  के बीच विनिमय दर का करार खत्म हो गया और मुद्राओं का विनिमय मूल्य  मांग और पूर्ती के आधार पर होने लगा|

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 डॉलर सबसे मजबूत मुद्रा होने कारण –

1. इंटरनेशनल स्टैंडर्ड ऑर्गेनाइज़ेशन (International Standard Organization)  के अनुसार  दुनिया भर में कुल 185 मुद्राएँ (Currencies) हैं, किंतु इनमें से ज़्यादातर मुद्राओं का इस्तेमाल अपने देश के भीतर ही होता है, कोई भी मुद्रा दुनिया भर में किस हद तक प्रचलित है यह उस देश की अर्थव्यवस्था और ताक़त पर निर्भर करता है| डॉलर की मज़बूती और उसकी स्वीकार्यता अमरीकी अर्थव्यवस्था (U.S Economy) की ताक़त को दर्शाती है|
2.  दुनिया का 85% व्यापार अमेरिकी डॉलर (U.S. Dollar) की मदद से होता है, दुनिया भर के 39% क़र्ज़ अमेरिकी डॉलर (U.S. Dollar) में दिए जाते हैं और कुल डॉलर की संख्या के 65% का इस्तेमाल अमरीका के बाहर होता है, इसलिए विदेशी बैंकों और देशों को अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर की ज़रूरत होती है|
3. विश्व बैंक (World Bank) और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (International monetary fund) में देशों के कोटे में भी सदस्य देशों को कुछ हिस्सा अमेरिकी डॉलर  (U.S. Dollar) के रूप में जमा करना पड़ता है|
4. दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों (Central banks) में जो विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign exchange reserves) होता है उसमें 64% अमरीकी डॉलर होते हैं|
5. विश्व के ज्यादातर सभी देश भी एक दूसरे के साथ व्यापार करते हैं तो भुगतान के रूप में वे अमेरिकी डॉलर (U.S. Dollar) लेना पसंद करते हैं|
6. अमेरिकी डॉलर (U.S. Dollar) की विनिमय दर (Exchange rate) में बहुत अधिक उतार-चढ़ाव नहीं होता है इसलिए देश इस मुद्रा को तुरंत स्वीकार कर लेते हैं|
7. अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है जिसके कारण यह बहुत से गरीब देशों को अमरीकी डॉलर (U.S. Dollar) में ऋण देता है और ऋण बसूलता भी उसी मुद्रा में हैं जिसके कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर की मांग हमेशा रहती है|
8. अमेरिका विश्व बैंक समूह और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के खजानों में सबसे अधिक योगदान देता है इस कारण ये संस्थान भी सदस्य देशों को अमेरिकी डॉलर में ही कर्ज देते हैं, जो कि डॉलर की वैल्यू को बढ़ाने के मददगर होता है|

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 डॉलर (Dollar) के बाद दुनिया में सबसे ज्यादा प्रचलित मुद्रा यूरो (Euro) है जो दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों के विदेशी मुद्रा भंडार में 20% है, यूरो (Euro) को भी पूरे विश्व में आसानी से भुगतान के साधन के रूप में स्वीकार किया जाता है, दुनिया के कई इलाक़ों में यूरो  (Euro) का प्रभुत्व भी है, यूरो (Euro) इसलिए भी मज़बूत है क्योंकि यूरोपीय यूनियन (European Union) दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है

डॉलर को चीनी और रूसी चुनौती 

मार्च 2009 में चीन (China) और रूस (Russia) ने एक नई वैश्विक मुद्रा की मांग की वे चाहते हैं कि दुनिया के लिए एक रिज़र्व मुद्रा (Reserve currency) बनाई जाए ‘जो किसी एक देश के प्रभुत्व से अलग हो और लंबे समय तक स्थिर रहने में सक्षम हो|

इसी कारण चीन (China) चाहता है कि उसकी मुद्रा “युआन -Yuan” वैश्विक विदेशी मुद्रा बाज़ार में व्यापार के लिए व्यापक तरीक़े से इस्तेमाल हो, अर्थात चीन, युआन को अमेरिकी डॉलर की वैश्विक मुद्रा के रूप में इस्तेमाल होते देखना चाहता है. ज्ञातव्य है कि चीन की मुद्रा युआन को IMF की SDR Baskets में 1 अक्टूबर 2016 को शामिल किया गया था|

यूरोपियन यूनियन (European Union) की एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2016 में विश्व के कुल निर्यात में अमेरिका का हिस्सा 14% और आयात में अमेरिकी हिस्सा 18% था, तो इन आंकड़ों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि अमेरिकी डॉलर के मजबूत होने के पीछे सबसे बड़ा कारण अमेरिका का विश्व व्यापार में महत्व और डॉलर की अंतरराष्ट्रीय बाजार में वैश्विक मुद्रा के रूप में सर्वमान्य पहचान है|

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