उच्चतम न्यायालय की शक्तियां व क्षेत्राधिकार

High Court's Powers and Territorial Rights

भारतीय संविधान द्वारा उच्चतम न्यायालय को व्यापक शक्तियां व क्षेत्राधिकार प्रदान किए गए है । ब्रिटेन के उच्च सदन (House of Lords) की तरह भारत में उच्चतम न्यायालय को न्यायिक समीक्षा की शक्ति प्राप्त है जिसे निम्न वर्गों में वर्गीकृत किया गया है —

  • मूल / आरंभिक क्षेत्राधिकार
  • अपीलीय क्षेत्राधिकार
  • परामर्शी / सलाहकारी क्षेत्राधिकार
  • न्यायिक समीक्षा

मूल क्षेत्राधिकार (Original jurisdiction)

इसके अंतर्गत कुछ मामलों की सुनवाई सीधे उच्चतम न्यायालय कर सकता है तथा ऐसे मामलों में निचली अदालत में सुनवाई आवश्यक नहीं है , उच्चतम न्यायालय का मूल क्षेत्राधिकार उसे संघीय मामलों से  संबंधित सभी विवादों में निर्णायक की भूमिका प्रदान करता है| उच्चतम न्यायालय के मूल क्षेत्राधिकार में आने वाले मामलें  निम्न है —

  • केंद्र व राज्यों के मध्य विवाद
  • दो या दो से अधिक राज्यों के मध्य विवाद
  •  मूल अधिकारों से संबंधित मामलें
  • राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति संबंधी विवाद

अपीलीय क्षेत्राधिकार (Appellate jurisdiction)

उच्चतम न्यायालय को अपने अधीनस्थ उच्च न्यायालयों के निर्णयों के विरुद्ध अपील सुनने का अधिकार है , इसके अंतर्गत किसी भी व्यक्ति द्वारा उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में अपील की जा सकती है किंतु उच्च न्यायालय को यह प्रमाण पत्र देना होता है कि वह मुक़दमा उच्चतम न्यायालय में अपील करने योग्य है| अपीलीय क्षेत्राधिकार को 4 वर्गों में विभाजित किया गया है —

  • संवैधानिक मामलें 
  • दीवानी मामलें
  • फौजदारी मामलें  
  • विशिष्ट मामलें 

संवैधानिक मामलें 

इसके अंतर्गत उच्चतम न्यायालय में उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध अपील की जा सकती है बशर्ते उच्च न्यायालय यह प्रमाणित कर दे कि उस मामलें का संबंध संविधान की व्याख्या से जुड़े किसी वास्तविक प्रसंग  से है अत: संविधान की व्याख्या की आवश्यकता है | यदि ऐसा उच्च न्यायालय द्वारा प्रमाणित न किया जाए तो भी उच्चतम न्यायालय किसी महत्वपूर्ण मामलें पर अपील कर सकता है |

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दीवानी मामलें 

दीवानी मामलों में उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में अपील की जा सकती है , किंतु उच्चतम न्यायालय यह प्रमाणित कर दे कि –

  • मामलें का संबंध सार्वजनिक महत्व से है |
  • मामलें का निर्णय उच्चतम न्यायालय में किया जाना आवश्यक है|

फ़ौजदारी मामलें 

फ़ौजदारी मामलों में भी उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में अपील की जा सकती है –

  • जब किसी अपराधी को अधीनस्थ न्यायालय ने छोड़ दिया हो लेकिन उच्च न्यायालय में अपील होने पर उसे मृत्यु दंड दिया गया हो |
  • किसी मामलें को उच्च न्यायालय ने अपने अधीनस्थ न्यायालय से लेकर अपने पास हस्तांतरित कर लिया हो तथा अपराधी को मृत्यु दंड दिया गया हो |

विशिष्ट मामलें 

इसके अंतर्गत उच्चतम न्यायालय भारत के न्यायक्षेत्र में  किसी न्यायालय अथवा अधिग्रहण द्वारा किसी वाद या मामलों में दिए गए किसी निर्णय में डिक्री (Order) , अवधारणा , दंडादेश  की विशेष अनुमति दे सकता है किंतु सशस्त्र बलों से संबंधित किसी विधि द्वारा या उसके अधीन गठित किसी न्यायालय या अधिग्रहण द्वारा दिए गए किसी निर्णय के संदर्भ में उच्चतम न्यायालय को यह शक्ति प्राप्त नहीं होगी|

परामर्शी क्षेत्राधिकार  (Advisory jurisdiction)

अनु० – 143 के अनुसार राष्ट्रपति को दो मामलों में उच्चतम न्यायालय से सलाह लेने का अधिकार प्राप्त है –

  • सार्वजनिक महत्व के किसी मामलें पर जो विधि से संबंधित हो|
  • किसी पूर्व संवैधानिक संधि , समझौते , सनद आदि मामलों पर किसी विवाद के उत्पन्न होने की स्थिति में

प्रथम मामलें में उच्चतम न्यायालय अपना  मत दे भी सकता है और नहीं भी किंतु दूसरे मामलें में उच्चतम न्यायालय द्वारा राष्ट्रपति को अपना मत देना अनिवार्य है|

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अभिलेख न्यायालय   (Record court)

अनु० – 129 के अनुसार उच्चतम न्यायालय को अभिलेखों के न्यायालय के रूप में दो शक्तियां प्राप्त है –

  • उच्चतम न्यायालय के फैसले सर्वकालिक अभिलेख व साक्ष्य के रूप में रखे जाते है तथा उन्हें आधार मानकर न्यायालयों के निर्णय दिए जाते है|
  • उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णयों को किसी  न्यायालय में चुनौती नहीं दी सकती है तथा उच्चतम न्यायालय को यह अधिकार भी है की वह अपनी अवमानना के लिए दंडित कर सके , इसके लिए लगभग 6 माह तक सामान्य जेल या 2000 रू० अर्थदंड या दोनों हो सकते है|

न्यायिक समीक्षा (Judicial review)

उच्चतम न्यायालय को अपने निर्णयों की समीक्षा करने का अधिकार प्राप्त है यदि उच्चतम न्यायालय को यह प्रतीत हो कि उसके द्वारा दिए गए निर्णय में किसी पक्ष के प्रति न्याय नहीं हुआ है , तो वह अपने निर्णय पर पुनर्विचार कर सकता है तथा उसमे आवश्यक परिवर्तन कर सकता है|

अन्य शक्तियां 

संवैधानिक न्यायपीठ की स्थापना 

उच्चतम न्यायालय ने सामाजिक मामलों से जुड़े मामलों को शीघ्रता से निपटाने के लिए 2014 में सामाजिक न्यायपीठ का गठन किया गया जिसके प्रथम अध्यक्ष (H.L Dattu) थे| संवैधानिक न्यायपीठ को  2 न्यायधीशों की बेंच बनाया गया है यह पीठ प्रत्येक शनिवार को सुनवाई कर सकते है|

मौलिक अधिकारों की रक्षा की शक्ति 

उच्चतम न्यायालय को किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का हनन होने पर 5 रिट जारी करने की शक्ति प्राप्त है —

  • बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas corpus)
  • परमादेश (Mandamus)
  • उत्प्रेषण
  • प्रतिषेध
  • अधिकार पृच्छा (Quo Warranto)
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