संसदीय कार्यप्रणाली (Parliamentary Functioning)

parliamentary funcationing

अनु० – 118  के अंतर्गत संसद का प्रत्येक सदन अपनी प्रकृया और कार्यप्रणाली के लिए नियम बना सकता है , इसके अंतर्गत प्रश्न पूछने की विधि , विधिक प्रस्ताव व चर्चाएँ आदि आते है ।

प्रश्न काल 

संसद का पहला घंटा 11-12 a.m प्रश्नकाल के लिए होता है। इस दौरान सदस्यों द्वारा प्रश्न पूछे जाते है और सामान्यत: मंत्री  उत्तर देते है , प्रश्न तीन प्रकार  होते है —

तारांकित प्रश्न — इसका उत्तर मौखिक रूप से दिया जाता है और इसके बाद पूरक प्रश्न पूछे जाते है।

अतारांकित प्रश्न — इन प्रश्नों का उत्तर लिखित रूप में दिया जाता है इनके बाद पूरक प्रश्न नहीं पूछे जा सकते है।

अल्प सूचना प्रश्न — ऐसे प्रश्न जिन्हें कम से कम 10 दिन की पूर्व सूचना देकर पुचा जाता है इनका उत्तर भी लिखित रूप में दिया जाता है । सामान्यत: लोकमहत्व के प्रश्न होते है ।

शून्य काल 

संसद के दोनों सदनों में प्रश्नकाल के ठीक बाद का समय आमतौर पर शून्य काल (Zero Hour) के नाम से जाना जाता है। यह नाम 1960 – 1970  दशक के आरंभिक वर्षो में किसी समय समाचार पत्रों द्वारा तब दिया गया बिना पूर्व सूचना के लोकमहत्व के प्रश्न उठाने की प्रथा विकसित हुई । शून्य काल का उल्लेख संसदीय नियमावली में नहीं है ।

गैर सरकारी सदस्यों द्वारा पूछे जाने वाले प्रश्न 

इस प्रकार के प्रश्न कभी-कभी लोकसभा में पूछे जाते है इन प्रश्नों के बाद अनुपूरक प्रश्न नहीं पूछे जा सकते है ।

आधे घंटे की चर्चा  

किसी ऐसे प्रसंग से उत्पन्न होने वाले मामलों पर जिसका उत्तर सदन में दिया जा चुका हो । 1/2 घंटे की चर्चा के लिए सप्ताह में तीन दिन (सोमवार , बुधवार , शुक्रवार) को बैठक अंतिम आधे घंटे में की जाति है ।

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प्रस्ताव

किसी विषय पर सदन की राय जानने वाले मसौदे को प्रस्ताव कहा जाता है , ऐसे  प्रस्ताव निम्न प्रकार के होते है —

विश्वास प्रस्ताव  

यह प्रस्ताव सत्ता पक्ष द्वारा लाया जाता है ऐसा प्रस्ताव सत्तापक्ष राष्ट्रपति के निर्देश पर प्रस्तुत करता है , आम चुनावों के पश्चात प्रत्येक सरकार को राष्ट्रपति द्वारा दी गई अवधि के अंतर्गत लोकसभा में अपना बहुमत सिद्ध करने के लिए विश्वास प्रस्ताव लाना पड़ता है ।

अविश्वास प्रस्ताव  

यह कम से कम सदन के 50 सदस्यों द्वारा उनके हस्ताक्षर से लाया जा सकता है, इसके लाए जाने के कारणों का उल्लेख आवश्यक नहीं परन्तु इसके पारित होने पर सरकार या मंत्रीपरिषद् समाप्त हो जाति है ।

निंदा प्रस्ताव

सदन में विपक्ष द्वारा 50 सदस्यों के हस्ताक्षर से किसी मंत्री या मंत्रिपरिषद की आलोचना के लिए यह प्रस्ताव लाया जाता है , इसके पारित होने पर सरकार पर दबाव बनता है किंतु सरकार त्यागपत्र देने के लिए बाध्य नहीं है ।

ध्यानाकर्षण प्रस्ताव  

यह प्रस्ताव 1954 में भारत में विकसित हुआ इसके तहत समाचार पत्रों , TV पर प्रकाशित खबरों या लोक महत्व के किसी मामलों पर सदन का ध्यान खीचने के लिए यह लाया जाता है इसे लेन से पूर्व 10 : 00 am से पहले सूचना देना अनिवार्य है।

स्थगन प्रस्ताव 

इस प्रस्ताव को पेश करने का मूल उद्देश्य हाल के किसी लोकमहत्व के किसी ऐसे मामलें की ओर है जिसके गंभीर परिणाम हो सकते है और उचित सूचना देने में देर हो सकती है और इस और सदन का ध्यान खीचना है ।

ऐसे प्रस्ताव सदन की कार्य सूची से कार्य को रोककर लाया जाता है । इसे लेन के लिए 50 सदस्यों का समर्थन और अध्यक्ष के हस्ताक्षर आवश्यक है ।

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अल्पकालिक चर्चा  

यह गैर – सरकारी सदस्य द्वारा लोकमहत्व (सार्वजनिक महत्व ) के मामलें सदन के ध्यान में लेन का तरीका है । इसके लिए प्रत्येक सप्ताह के तीन दिन 2 घंटे की चर्चा की जाती  है , क्योंकि इस प्रकार की चर्चा में दो घंटे से अधिक का समय नहीं लगता है।

Note :

नियम 184 – इस पर विचार विमर्श के बाद मतदान की व्यवस्था है, अत: सरकार इस नियम के अंतर्गत बहस नहीं करना चाहती है ।

नियम 193 – इस नियम के अंतर्गत केवल विचार विमर्श की व्यवस्था है मतदान की नही ।

नियम 56 – लोकमहत्व के किसी विषय पर इस नियम के अंतर्गत विचार किया जा सकता है । जैसे – स्थगन प्रस्ताव

नियम 41 – सदन में पूछे गए प्रश्नों को स्वीकार करना व निम्न श्रेणियों में विभाजित करना इस नियम के अंतर्गत होता है । 

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