महमूद गजनवी के भारत पर आक्रमण

महमूद गजनवी (Mahmoud Ghaznavi) के भारत पर किए गए आक्रमण के संदर्भ में विद्वानों में मतभेद है| हेनरी इलियट के अनुसार  1000 से 1027 ई० के मध्य  में महमूद ने भारत पर 17 बार आक्रमण किया|

प्रथम आक्रमण (1000 ई०) — 

महमूद गजनवी का प्रथम आक्रमण 1000 ई० में हिन्दुशाही राज्य के सीमावर्ती नगरों पर हुआ तथा कुछ दुर्गों पर अधिकार करने के बाद वह वापस गजनी लौट गया।

दूसरा आक्रमण (1001 ई०) — 

1001 ई० में महमूद गजनवी का दूसरा आक्रमण  में हिन्दुशाही राज्य पर हुआ,  इस समय हिन्दूशाही वंश का राजा जयपाल था महमूद गजनवी व जयपाल के मध्य पेशावर के निकट युद्ध हुआ जिसमें जयपाल पराजित हुआ महमूद ने हिन्दूशाही वंश की राजधानी वैहिन्द (उद्भाण्डपुर) पर अधिकार कर लिया।  जयपाल इस पराजय के अपमान को सहन नहीं कर सका और उसने  आत्मदाह कर लिया।

तीसरा आक्रमण (1004 ई.) —

1001 ई० में महमूद ग़ज़नवी ने उच्छ के शासक वाजिरा को दण्डित करने के लिए आक्रमण किया| महमूद के आक्रमण के कारण वाजिरा सिन्धु नदी के किनारे जंगल में शरण लेने को भागा और अन्त में उसने आत्महत्या कर ली|

चौथा आक्रमण (1005 ई.) — 

1005 ई. में महमूद ग़ज़नवी ने मुल्तान पर आक्रमण किया इस समय यहाँ का शासक दाऊद था| इस आक्रमण के दौरान ग़ज़नवी ने भटिण्डा के शासक आनन्दपाल को पराजित किया तथा उसके बाद में दाऊद को पराजित कर उसे अधीनता स्वीकार करने के लिए बाध्य कर दिया|

पाँचवा आक्रमण (1007 ई.) —

1007 ई. में महमूद गजनवी ने पांचवा आक्रमण सुखपाल को दण्ड देने के लिए किया था, क्योंकि सुखपाल ने उसकी अधीनता और इस्लाम धर्म दोनों को त्याग दिया था| सुखपाल को पराजित कर उसे बन्दी गृह में डाल दिया गया|

छठा आक्रमण (1008 ई०) —

1008 ई. महमूद का छठा आक्रमण आनन्दपाल के विरुद्ध था| आनन्दपाल ने महमूद के आक्रमण के लिए उज्जैन के परमार, ग्वालियर के कच्छवाहा, कालिंचर के जलचरी, कन्नौज के राठौर तथा दिल्ली और अजमेर के चौहान राजाओं का एक संघ बनाया| पंजाब के खोखर लोगों ने भी आनन्दपाल की सहायता की|

सिन्धु नदी के किनारे पेशावर के पास एक निर्णायक युद्ध हुआ| 30,000 खोखरों ने ऐसा प्रहार किया कि महमूद गजनवी की सेना विचलित होने लगी। महमूद गजनवी पीछे हटने के लिए सोचने लगा। किन्तु दुर्भाग्य से महमूद की सेना द्वारा छोड़ी गयी अलकतरे की अग्निज्वालाओं से भयभीत होकर आनन्दपाल का हाथी मैदान से भाग निकला तथा आनंदपाल की सेना पराजित हुई |

सातवाँ आक्रमण(1109 ई०) — 

1009 ई० में महमूद गजनवी ने  7 वाँ आक्रमण कांगड़ा के पहाड़ी प्रदेश नागरकोट पर किया । हिन्दुओं ने नागरकोट के किले में बहुत सा धन एकत्र कर रखा था, यहाँ महमूद का किसी शासक ने विरोध नहीं किया | फरिश्ता के अनुसार, महमूद 700,000 स्वर्ण दीनार, 700 मन चांदी के पात्र, 200 मन शुद्ध स्वर्ण मुद्राएं: 2000 मन अपरिष्कृत रजत, तथा 20 मन पन्ने, हीरे, रत्न, मोती आदि बहुमूल्य मणियां लेकर भारत से वापस लौटा|

आठवां आक्रमण (1010 ई०) — 

1010 ई० में महमूद गजनवी ने मुल्तान पर पुनः आक्रमण (दूसरा आक्रमण) किया वहां के विद्रोही शासक दाऊद को पराजित कर मुल्तान पर अधिकार कर लिया|

नौवां आक्रमण (1011-1012 ई०) — 

महमूद का 9वां आक्रमण थानेश्वर पर था। वहाँ के चक्रस्वामी मंदिर को लूटा, मार्ग में डेरा के शासक ने रोकने का प्रयास किया किन्तु असफल रहा|

दसवां आक्रमण(1012 ई०) — 

हिन्दुशाही राज्य में आनन्दपाल की मृत्यु के बाद इसका पुत्र त्रिलोचन पाल गद्दी पर बैठा| त्रिलोचलन पाल का भी महमूद गजनवी के आक्रमण का सामना करना पड़ा तथा पराजित हुआ|

11 वाँ आक्रमण (1015 ई.) — 

1015 ई. में महमूद का यह आक्रमण त्रिलोचनपाल के पुत्र भीमपाल के विरुद्ध था, जो कश्मीर पर शासन कर रहा था| इस युद्ध में भीमपाल पराजित हुआ|

12वाँ आक्रमण (1018 ई.) — 

1018 ई. में महमूद ग़ज़नवी ने कन्नौज पर आक्रमण किया, तथा बुलंदशहर के शासक हरदत्त तथा महाबन के शासक बुलाचंद को पराजित किया| 1019 ई. में उसने पुनः कन्नौज पर आक्रमण किया यहाँ के शासक राज्यपाल ने बिना युद्ध किए ही आत्मसमर्पण कर दियाइससे कालिंजर का चंदेल शासक क्रोधित हो गया तथा  कन्नौज पर आक्रमण कर उसने राज्यपाल को मार डाला|

13 वाँ आक्रमण (1020 ई.) — 

1020 ई. में महमूद ने  तेरहवाँ आक्रमण  में हुआ था, इस अभियान में उसने बारी, बुंदेलखण्ड, किरात तथा लोहकोट आदि को जीत लिया|

14 वाँ आक्रमण (1021 ई.) — 

1021 ई. में महमूद ने यह आक्रमण कालिंजर का चंदेल शासक को दण्डित करने के लिए किया था क्योंकि राज्यपाल महमूद से बिना युद्ध किए ही भाग गया था जिसे राजपूत शासकों ने एक कलंक समझा तथा राज्यपाल पर आक्रमण कर उसकी हत्या कर दी|

15 वाँ आक्रमण (1021-22 ई०) — 

महमूद पुनः भारत आया तथा पंजाब में प्रवेश किया| इस बार उसने पंजाब का प्रशासन अपने हाथ में लिया तथा पंजाब पर अधिकार करने के पश्चात ही महमूद गजनवी ने पंजाब के प्रचलित शाही सिक्कों को ही अपनाया| उसके अपने सिक्कों पर “घुड़सवार तथा नंदी चिन्ह” जो पहले से प्रचलित था, को अपनाया और उस पर संस्कृत भाषा में “आव्यक्तमेकं अवतार महमूद खुदवाया| महमूद द्वारा प्रचलित सिक्के दिल्लीवाला के नाम से प्रसिद्ध थे जिसका वजन 56 ग्रेन था।

16 वाँ / सोमनाथ पर आक्रमण (1025-26 ई०) — 

अपने 16वें आक्रमण में गज़नवी ने विशाल सेना लेकर सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया, महमूद गजनवी का यह सबसे प्रसिद्ध अभियान था|इस आक्रमण का मुख्य कारण इस मंदिर में  था जो महमूद गजनवी के आक्रमण का मुख्य कारण बनायह मंदिर गुजरात में समुद्र तट पर अपनी अपार अपार संपत्ति के लिए प्रसिद्ध था| इस मंदिर को लूटते समय महमूद ने लगभग 50,000 ब्राह्मणों एवं हिन्दुओं का कत्ल कर दिया|

17 वां और अन्तिम आक्रमण (1027 ई०) — 

जाटों व खोखरों को दण्डित  देने के लिए महमूद गजनवी ने 1027 ई० में भारत पर अन्तिम आक्रमण किया क्योकिं सोमनाथ मंदिर को लूट कर जाते समय जाटों व खोखरों ने महमूद की सेना को अत्यधिक क्षति पहुंचाई थी। 1030 ई० में महमूद गजनवी की मृत्यु हो गयी।

 

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