चाबहार बंदरगाह भारत को सौंपने का ईरान का एलान (Iran declares to hand over Chabahar port to India)

चाबहार बंदरगाह को भारत सरकार की महत्वाकांक्षी परियोजनाओं में गिना जाता हैं, लेकिन इसके साथ ये भी सच ये हैं कि चाबहार बन्दरगाह को विकसित करने के पीछे  ना सिर्फ भारत को लाभ हैं बल्कि ईरान और अफगानिस्तान को भी इस बंदरगाह से काफी फायदा होगा|
हालांकि ये बन्दरगाह भारत को आर्थिक रूप से बहुत लाभ पहुंचाने वाला है, लेकिन यह  भारत के लिए कूटनीतिक और सामरिक महत्व रखने वाला बन्दरगाह भी हैं|

chabhaar-port trade route

चाबहार बंदरगाह की स्थिति

  • चाबहार बंदरगाह ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में स्थित हैं| ओमान की खाड़ी में स्थित यह बंदरगाह ईरान के दक्षिणी समुद्र तट को  भारत के पश्चिमी समुद्री तट से जोड़ता  है|
  • चाबहार बंदरगाह ईरान के दक्षिणी-पूर्वी समुद्री किनारे पर बना हैं|
  • इस बंदरगाह को ईरान द्वारा व्यापार मुक्त क्षेत्र घोषित किया गया हैं|
  • यह पाकिस्तान के गवादर बंदरगाह के पश्चिम की तरफ मात्र 72 किलोमीटर की दूरी पर हैं.
  • ईरान का सबसे बड़ा  बंदरगाह  बंदर-ए-अब्बास है, जो कि संयुक्त अरब अमीरात (United Arab Emirates- UAE) और ओमान (Oman) के बहुत नजदीक स्थित हैं, और इस पर बड़े देशों द्वारा चौकसी की जाती हैं, क्योंकि यहाँ से मध्य पूर्वी देश विभिन्न देशों को अपना बहुकिमती तेल भेजते हैं|
  • यह बंदरगाह ईरान के लिए एक स्वायत और स्वतंत्र बंदरगाह नहीं हैं, इसलिए ईरान को एक अन्य स्वतंत्र बंदरगाह की आवश्यकता है,
    जिसके लिए चाबहार में सम्भावना तलाशी जा सकती हैं|
  • इस बंदरगाह की भौगोलिक स्थिति भारत और अफगानिस्तान के साथ भी व्यापार के लिए बहुत अनुकूल हैं, क्योंकि अफगानिस्तान के साथ  भारत का केवल थल मार्ग ही जुड़ सकता हैं जो कि पाकिस्तान द्वारा अधिकृत मार्ग से होकर गुजरता हैं| अफगानिस्तान सब तरफ से थल से गिरा हुआ देश हैं, यहाँ तक पहुँचने के लिए  कोई समुद्री मार्ग नहीं हैं, ऐसे में भारत के लिए ईरान का ये बंदरगाह ईरान के अलावा अफगानिस्तान के साथ के संबंधो को सुधारने में भी सहायक हो सकता हैं.
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चाबहार बंदरगाह परियोजना की शुरुआत

2002 में ईरान और तत्कालीन भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार  हसन रौहानी और ब्रजेश मिश्रा के मध्य हुई वार्ता में चाबहार बंदरगाह के विकास में भारत के योगदान की नीव रखी गयी थी| इसके कुछ महीने बाद  जनवरी 2003 में ईरान के राष्ट्रपति खातमी भारत में गणतंत्  दिवस की परेड में मुख्य अतिथि के रूप में आए और तब उन्होंने और तत्कालीन  प्रधानमंत्री अटल बिहारी _वाजपेयी ने भारत के इस महत्वकांक्षी परियोजना पर हस्ताक्षर किए|

चाबहार आधारित इस परियोजना का उद्देश्य के अनुसार दक्षिण एशियाई उप-महाद्वीप को अरब की खाड़ी (Persian Gulf), अफगानिस्तान, मध्य एशिया और यूरोप से जोड़ना था| लेकिन कालान्तर में कुछ कारणों से यह परियोजना सही दिशा नहीं पकड़ सकी,और इस पर काम रुक गया, लेकिन 2015 में इसे पुन: जीवित किया गया|

इस परियोजना में लगा  समय

भारत और ईरान के बीच यह सामरिक-आर्थिक सहयोग दोनों देशों की तालिबानी हुकूमत के खिलाफ पृष्ठभूमि बनाने जैसा था और इस तरह से दोनों देश उस समय अहमद शाह मसूद के नेतृत्व वाले उत्तरी गठबंधन के प्रमुख पीठ के बीच जा फंसे. इस कारण खातमी-वाजपेयी की ये द्विपक्षीय महत्वकांक्षी परियोजना उस समय अपने लक्ष्य की तरफ नहीं बढ़ पाई|

सबसे बड़ी समस्या जो भारत के इस दिशा में व्यापार करने की थी, वो थी मार्ग में पाकिस्तान का होना,क्योंकि पाकिस्तान अपना थल और वायु मार्ग भारत के लिए बंद रखता था, जिस कारण भारत को चाबहार परियोजना को यथार्थ के धरातल तक पहुंचाने में समय लगा, वास्तव में पाकिस्तान और भारत के सम्बंध इतने वर्षों में कोई स्थिरता प्राप्त नहीं कर सके,ऐसे में चाबहार परियोजना का सफल होना मुश्किल होता चला गया|

इसके अलावा तात्कालिक अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश के ईरान को इराक और नार्थ कोरिया के साथ “एक्सिस ऑफ़ एविल” में शामिल करने पर भारत को भी तेहरान के साथ अपने रिश्ते ख़त्म करने पड़े, जिसके कारण यह परियोजना ना चाहते हुए भी रुक गयी| ईरान के विवादित न्यूक्लियर प्रोग्राम के कारण भी चाबहार परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी|

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 चाबहार परियोजना (Chabahar Project)

मई 2015 में भारत ने ईरान के साथ महत्वपूर्ण समझौता किया था, जिसके अंतर्गत चाबहार बंदरगाह के विकास में भारत के योगदान का अनुबंध किया गया था| चाबहार समझौते से भारत, ईरान और अफगानिस्तान तीनों देशों को फायदा मिलेगा| ईरान के लिए ये अलगाव के वर्षों का अंत होगा| 2015 में यूएस-ईरान न्यूक्लिअर समझौते (US-Iran nuclear deal) के बाद इस त्रिपक्षीय समझौते से ईरान को अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने का मौका मिला हैं| भारत के लिए यह ईरान और मध्य एशिया तक व्यापार के क्षेत्र में अपने पैर ज़माने का सुअवसर होगा| वहीँ अफगानिस्तान के लिए अपनी पाकिस्तान पर निर्भरता खत्म करने का एक सुनहरा अवसर होगा|

एक माह के भीतर चाबहार बंदरगाह भारत को सौंपने का ईरान का एलान (Iran declares to hand over Chhabar port India within a month)

ईरान के शहरी विकास मंत्री अब्बास अखुंदी ने कहा है कि एक अंतरिम समझौते के तहत एक महीने में चाबहार बंदरगाह को भारतीय कंपनी के हवाले कर दिया जाएगा ताकि वहां से काम शुरू हो सके। #_अखुंदी_नीति_आयोग_की_मोबिलिटी_समिट में हिस्सा लेने के लिए भारत आए हुए हैं। उन्होंने कहा कि भारत ने भी चाबहार पोर्ट में निवेश किया है। उसे शुरू करने की सारी तैयारियां हो चुकी

मध्य एशिया तक हो सकेगा व्यापार

चाबहार पोर्ट को ईरान-अफगानिस्तान के अलावा मध्य एशिया में व्यापार के लिए एक द्वार की तरह देखा जा रहा है। अब भारत, ईरान और अफगानिस्तान को आपसी व्यापार के लिए पाक की अनुमति नहीं लेनी पड़ेगी। समझौते के मुताबिक, चाबहार पोर्ट के पहले चरण के लिए भारत 85.21 मिलियन डॉलर (610 करोड़ रु.) का निवेश करेगा। 10 साल की लीज पर भारत को 22.95 मिलियन डॉलर (165 करोड़ रु.) राजस्व मिलेगा।

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